Tuesday, 11 December 2012





वज़्न

*******

उर्दू शायरी में सबसे महत्त्वपूर्ण तत्व होता है अक्षर  का वज़्न ... हर शब्द का एक निश्चित वज़्न होता है.... जिसे ग़ज़ल के हर मिसरे (( लाइन )) में  सही शब्द रखना होता है....


वज़्न की गणना हम उसके उच्चारण के द्वारा करते हैं .... और उच्चारण के आधार पे इन्हें 2  स्तम्भ में बाँट लेते हैं ....

१..लघु शब्द ...

२..  गुरु शब्द ....

************************************

१. लघु शब्द

लघु शब्द वो होते हैं जिन्हें  उच्चारण में हम सिर्फ एक बार में कह लें ....

जैसे -- क .. च ... म .... प ... र... ल... य.... अ... भ.... इत्यादि...

और सभी छोटी इ और छोटे उ की मात्र वाले शब्द ...

जैसे-- दि... दु .. मि ... कि ....

ग़ज़ल के मात्रिक चाँद में इन शब्दों को 1 गिना जाता है....




२.. गुरु शब्द

गुरु शब्द वो शब्द होते हैं जिनके उच्चारण में हम बड़ी मात्रायें लगाते  हैं ...

जैसे - ई .... क़ी ... फी .... जी.... कू .. रू ... तू.... गो ... को... जो....इत्यादि...

Thursday, 6 December 2012

एक लघुकथा


मुफ्त

घर में कदम रखते ही उसकी नज़र अस्त-व्यस्त पड़े हुए कमरे पे पड़ी .... सामन इधर -उधर ऐसे बिखरे थे जैसे कोई भूचाल आया हो... लेकिन रोज़ का यही मंज़र उसे ये एहसास था की कोई भूचाल नहीं ये तो उसके बच्चों की शरारत है ... और रोज़ होती

है   ... दिन भर स्कूल में सर-खपाई करो ... और घर आओ तो ये सब ... .टूटे हुए सामान देखकर  आज उसका गुस्सा चरम पे था... दोनों बच्चों के गालों पे ज़ोर की चपत लगाईं ... ""मुफ्त में नहीं आते सामान .. इसके पैसे लगते हैं ...."""

भाव -- ""बच्चे शायद मुफ्त आते हैं''
 
 
 
2..
बारिश

बारिश का मौसम उसे बहुत पसंद था... सच तो यही है की साल के सभी महीनो में बारिश से उसे खासा लगाव था.... बुढ़ापे में तो बारिश उसे और भी पसंद आने लगी... जन्म का साल तो उसे मालूम नहीं था... और याद रखता भी कौन... लेकिन उ
से अपनी उम्र कुछ 60 के आस पास लगती थी... अब हाथ पैर का दर्द और साँस का फूलना भी इसी तरफ इशारा करते की उसकी उम्र हो गयी है....


लेकिन रोज़ी-रोटी के लिए काम तो करना ही होता है न... खाली पेट काम कैसे चले ... फिर घरवाली ... उसकी भी तो ज़िम्मेदारी है ...बाल-बच्चे भी सब कमाने निकले तो वापस न लौटे ...अब तो यही 2 प्राणी रह गए...

वैसे वो स्कूल के बच्चों को लाने -छोड़ने का काम करता ... इस उम्र में ज्यादा वज़न उठाना भी तो मुश्किल होता ,....इसीलिए रिक्शा लेकर सिर्फ स्कूली बच्चे लाने -ले जाने का काम कर लेता .... गुज़र -बसर के लायक पैसे मिल जाते.....

लेकिन बारिश का अपना मज़ा था... सवारी से जितना भाव कहो ... वो मना नहीं करती... और दिन में 2 -3 सवारी से ही उसे अच्छी आमदनी हो जाती....
सो वो स्कूल का काम निपटा ... निकल पड़ता सवारी खोजने .... सोचा इस बार 2 महीने में जो भी कमी करेगा ...उसे अपने आखिरी समय के लिए रखेगा ... अब उसकी और पत्नी की सेहत ठीक नहीं रहती....

पूरे बारिश उसने बहुत मेहनत की....पैसे भी अच्छे बनाये.... लेकिन बारिश में भीग भीग कर उसे बुख़ार रहने लगा ... फिर भी वो काम करता रहा...

जब ज्यादा तबियत ख़राब हुई तो घरवाली बड़े अस्पताल ले गयी... डॉ . ने कोई बड़ी बीमारी बताई ... और कहा इलाज़ में बहुत खर्च आएगा ....

शायद निमोनिया ....
 




3..

माँ

""जो करना है आज ही कर लेते हैं ... किसी को शक भी नहीं होगा ..""
घर से निकलते हुए पत्नी के कहे हुए ये शब्द उसके ज़ेहन में बार बार आते रहे... लेकिन पत्नी के लिए कहना जितना आसन था... खुद उसके लिए ये करना उतना ही मुश्किल...

बड़ा ही सुन्दर बचपन था उसका... माँ .. पिताजी ... और दो भाई... हँसता खेलता परिवार ... माँ -पिताजी ने उनको अच्छा बचपन और अच्छा भविष्य देने में कोई कसार नहीं छोड़ी थी... और उसी के 
फल स्वरूप आज वो दोनों भाई अपने अपने क्षेत्र में एक सफल जीवन व्यतीत कर रहे थे...

भाई पढ़-लिख कर आज अमरीका में नौकरी कर रहा था... और वो खुद भारत के एक महानगर में अच्छी खासी तनख्वाह वाली नौकरी में था... पिता की मृत्यु को 10 साल गुज़र गए थे .. अब माँ का क्या ....

माँ ने विदेश जाने से साफ़ मन कर दिया .. भला बुढ़ापे में कहाँ वो नए देश नयी संस्कृति से सामंजस्य करती ... सो माँ की जवाबदारी उसपर आ गयी .... उसे कोई शिकायत नहीं थी... लेकिन पत्नी ... उसे तो ज़िम्मेदारी का पहाड़ लगता ... हर वक़्त कोसती ... और हिसाब -किताब करती ... हमने कितनी ज़िम्मेदारी निभाई ...और बड़े भाई ने कितनी ज़िम्मेदारी ....

लेकिन जब से माँ बीमार हुई ... तब से उसका ये प्रलाप और बढ़ गया ... "" जब बेटे दो हैं तो क्यूँ अकेले हम ये ज़िम्मेदारी उठायें "" तुम्हारे भाई को भी तो माँ की चिंता होनी चाहिए ...""

मैं भैया की मजबूरी समझता भी था ... लेकिन स्वाभाविक है की पत्नी का विरोध नहीं कर पाता था.... और ऐसे ही दिन गुज़र रहे थे... इधर माँ की सेहत पिछले महीने से बहुत गिर गयी... और हॉस्पिटल .. दवा.. सेवा ... सभी बढ़ गए ...

अब पत्नी के दीमाग में खुराफात आने लगी... खर्च भी बचेगा ... और सेवा का टंटा भी टलेगा ... चुप चाप एकाध दवा माँ की इधर -उधर कर दो... वैसे ही बीमार हैं ... किसको क्या पता चलेगा ..... लोग सोचेंगे बीमारी में गुज़र गयी...

करना तो यही चाहिए था ... लेकिन मैं नादान पता नहीं कैसे पत्नी की बात में आ गया...सोचा की चलो इस बहाने रोज़ की ये खिट -पिट तो ख़त्म हो ...

इक रात हिम्मत कर के माँ के कमरे में गया ... कमरे में अँधेरा था... माँ शायद गहरी नींद में थी... बिना आह्ट के मैं माँ के बिस्तर की तरफ बढ़ रहा था... तभी माँ ने कहा -"" बबलू बहुत बेचैनी हुई... उलटी करने का जी किया ... कोई था नहीं .. इसीलिए यहीं नीचे कर ली...तुम लाइट जला लो .. कहीं पैर पड़ गया और फिसल गए तो चोट लग जाएगी..."""

और माँ के शब्द सुन कर वो सन्न रह गया ....



 

Monday, 26 November 2012

zakhM gayaB haiN bazaahir mere












BA-waqar Shayar .... azeem Fan-o-fikr ke maalik Janab Saalim Shuja Ansari sahab... aur apne ustaad ke sarparasti meN ek koshish...

----------------------------------------------------------
Jo khayalaat the aakhir mere.....
ho gaye sher se zaahir mere...

shayari kaise gazal kaise ho...
sher hone ko haiN qasir mere .....

aaj jazbaat bhi berang haiN kyuN ....
bhar koi rang musawwir mere ...

kam tajurbaa hai mujhe jeene me ...
kaise jazbe hoN muassir mere ....

roz aate ho mire khwaboN meN...
kaun lagte ho tum aakhir mere .....

is tarah baaNt liya he rab ko...
masjideN teri haiN mandir mere...

ab mujhe arsh pe ud lene do..
par katarne lage tum phir mere....

dard ki de to chuke ho saughaat....
aaj kya laye ho khaatir mere .....

zindagi aaj bahut yaad aayi ..
maut dar par hui haazir mere ..

raaz ko raaz bana kar rakhte .....
aap humraaz the aakhir mere ....

aankh meN noor abhi baqi he..
chhot jaane de manazir mere ...

rooh par ab bhi nishaN baqi he....
""zakhm gayab haiN bazaahir mere ""

raam rehta he mire seene meN ...
aye "MAHEK" dil me he mandir mere ....

*****************************

Meanings....

akhir = atleast ...
qasir= incomplete.. adhoore
musawwir=painter ,, chitrakaar
mua'ssir - effective.. asardaar
zahir -obvious,,  saaf -
manazir--landscape,, visual aid
khatir- sake.. khayal.. lehaaz...

Sunday, 9 September 2012




fitraton ko sanwar lete kaash ...
dard apne ubhar lete kaash....

aastino me saanp pale hain,
unko ek roz maar lete kash

ya khuda kuch qarar to milta
hum tujhe gar pukaar lete kaash ....

waqt ne thaam kar rakhi hai jo...
saans kuch hum udhar lete kaash...

aa nigahein bana ke tujhko yu'n
zindagi ki nigaar lete kaash...........

may zara sa pila ,,ke saaqi hum
zindagi se khumar lete kash ....

Sar uthatiN na hasrateN dil meiN
inko dil hi meiN maar lete kaash..

aaina ye tujhe dikha kar hum
tere kirdaar nikhar lete kaash

ai "Mahek" apne aas ka panchi. ..
is zamee pe utar lete kash...

*****************************************
फितरतों को सँवार लेते काश ...
दर्द अपने उभार लेते काश ....

आस्तीनों में साँप पाले हैं ,
उनको एक रोज़ मार लेते काश ,,,,

या खुदा कुछ करार तो मिलता ...
हम तुझे गर पुकार लेते काश ....

वक़्त ने थाम के रखी हैं जो ...
सांस कुछ हम उधार लेते काश ...

आ निगाहें बना के तुझ को यूँ ...
ज़िन्दगी की निग़ार लेते काश ...........

मय ज़रा सा पिला ,,के साक़ी हम ..
ज़िन्दगी से ख़ुमार लेते काश ....

सर उठातीं न हसरतें दिल में
इनको दिल ही में मार लेते काश ..

आइना ये तुझे दिखा कर हम ..
तेरे किरदार निखार लेते काश ...

ऐ "महक " अपने आस का पंछी. ..
इस ज़मीं पे उतार लेते काश ...

***********************
Avani Asmita Sharma ""MAHEK""

Monday, 27 August 2012









BHEENI KHUSHBOO SI FAZAAO'N MEIN BIKHAR JAATI HAI YU'N...
AU HAWAA BHI SHAAKH SE AISE GUZAR JAATI HAI YU'N.....


MUSKURATI HAI GHATA MEIN REH KE JO YE BIJLIYA'N....
AANKH MERI KHUD-B-KHUD UNPE THAHAR JATI HAI YU'N...


BAAG KE SAAYE MEIN MUJHSE BAAT KARTE HAIN WO JAB...
BAAT AISI HAI KI MERI JAA'N SIHAR JAATI HAI YU'N...

RAAT KE KHAMOSH PAL MEIN GUNGUNATI HUN TUJHE ...
HAAN TABIYAT AISI HI MERI SUDHAR JAATI HAI YUN....


SAANS UNKI SAANS MERI YUN MUSALSAL PAAS HAIN....
SAANS BHI AB FAANS BAN DIL MEIN UTAR JAATI HAI YUN...

KYU BHALA US NAAM PAR DIL KA DHADAK JANA MERA ....
RAAH USKI HI DAGAR MERI MAGAR JATI HAI YUN....

HAAN ""MAHEK TERI MAHEK SE IS CHAMAN MEIN HAI MAHEK....
BARISHON MEIN BHEEGTI KHILTI SAHAR JAATI HAI YUN ....

******************************************


भीनी खुशबू सी फ़ज़ाओं में बिखर जाती है यूँ ...
औ हवा भी शाख से ऐसे गुज़र जाती है यूँ .....


मुस्कुराती है घटा में रह के जो ये बिजलियाँ ....
आँख मेरी खुद -ब-खुद उनपे ठहर जाती है यूँ ...

बाग़ के साए में मुझसे बात करते हैं वो जब ...
बात ऐसी है की मेरी जाँ सिहर जाती है यूँ ...

रात के खामोश पल में गुनगुनाती हूँ तुझे ...
फिर तबियत ऐसी ही मेरी सुधर जाती है यूँ ....


सांस उनकी सांस मेरी यूँ मुसलसल पास हैं ....
सांस भी अब फांस बन दिल में उतर जाती है यूँ ...

क्यूँ भला उस नाम पर दिल का धड़क जाना मेरा ....
राह उसकी ही डगर मेरी मगर जाती है यूँ ....

हाँ ""महक "" तेरी महक से इस चमन में है महक ....
बारिशों में भीगती खिलती सहर जाती है यूँ ....

Avani Asmita Sharma "" Mahek""

Saturday, 25 August 2012

tarhi misre par apni ek koshish...ek gazal ..... sab doston ko pesh karti hu

******************************************

mujhko pehlu se yun laga dije...
pyar ka ab mujhe sila dije....

zakhm khakar n bhool jayein hum...
dard fir aaj kuch naya dije.....

jo labon ko bhi zindagi bakhshen,
saaz aisa koi sikha dije.

di lagana wo aap se mera,
yaad fir se mujhe dila dije

preet ka raag ga raha saawan ...
aaj fir geet wo suna dije...

bewafa hun ki ba-wafa hun main...
faisla fir naya suna dije....

aap se umr bhar ka rishta hai,
zindagi ki mujhe dua dije.

aaj alfaz kyun khamosh se hain
lafz honton pe ik saja dije

maan kar mujh ghareeb ko tanha,
aaiye sath kuchh mera dije

lut gayi hai meri saher kaise,
raunaq e bazm phir bana dije

pyar to aap hi se hai humko..
laakh chahe mujhe sazaa dije

loot le jo khushi ""mahak"" dil ki..
kyun use koi wasta dije ....

*****************************

मुझको पहलू से यूँ लगा दीजे ...
प्यार का अब मुझे सिला दीजे ....

ज़ख्म खाकर न भूल जायें हम ...
दर्द फिर आज कुछ नया दीजे .....

जो लबों को भी ज़िन्दगी बख्शें ,
साज़ ऐसा कोई सिखा दीजे .

दिल लगाना वो आप से मेरा ,
याद फिर से मुझे दिला दीजे

प्रीत का राग गा रहा सावन ...
आज फिर गीत वो सुना दीजे ...

बेवफा हूँ कि बा -वफ़ा हूँ मैं ...
फैसला फिर नया सुना दीजे ...

आप से उम्र भर का रिश्ता है ,
ज़िन्दगी की मुझे दुआ दीजे .

आज अल्फाज़ क्यूँ खामोश से हैं
लफ्ज़ होंटों पे इक सजा दीजे

मान कर मुझ ग़रीब को तनहा ,
आइये साथ कुछ मेरा दीजे

लुट गयी है मेरी सहर कैसे ,
रौनके बज़्म फिर बना दीजे

प्यार तो आप ही से है हमको ..
लाख चाहे मुझे सज़ा दीजे

लूट ले जो ख़ुशी ""महक "" दिल की ..
क्यूँ उसे कोई वास्ता दीजे ....

***********************************

Avani Asmita Sharma ""MAHAK"